अध्याय 29

जगत ग्रहण करे की इच्छा

将欲取天下而为之,吾见其不得已。天下神器,不可为也。为者败之,执者失之。
故物或行或随,或嘘或吹,或强或羸,或挫或隳。
是以圣人去甚,去奢,去泰。
जौन जगत के महिमा महेरा, हाथ से पकड़े की फेरा।\nकरना चाहई जग हस्त जाता, ना चाहे मन सबल बिछुराता।।\nजगत महान उपहार बनई, यह नहीं जात अधिकार बनई।\nजौन ईश्वर के बनावल चीज हवे, ओकर संभाल हम काहे ले करई।।\n\nकरतल जो करई हाथ बढ़ाई, बिगड़ि जाई सब काहू पछाई।\nजौन पकड़े राखे सबल भाखई, छूटि जाई सो जानि अलगाई।।\n\nएक चलई आगु एक पाछु, एक धीमा एक तेज राछु।\nएक सुखी एक दुखी भारी, एक उठई एक गिरई कुमारी।।\n\nजौन बुद्धिमान महा ग्यानी, परमारथ के ज्ञानी।\nबहुत कुछ ना करई सब कामा, बहुत ना खाई ना पिआवई कामा।।\nबहुत ना लेई ना देई बानी, जबरदस्ती ना करई कुमारी।।\n\nजब लगि बहुत कुछ करने की चाह, तब लगि सब कुछ बिगड़ि जाई नाह।\nबहुत कुछ लेने से पेट भरई, बहुत कुछ देन से हाथ हरई।।

गहरा चिंतन

यह अध्याय किस बारे में है?

जा chapter में कहा गइल बा कि जौन जगत के हाथ में लेने की चाह करई ले, ओकर देखा हम ओकर मन कहुँ ना भेजत बा। जगत एगो देव की प्रसाद बा, ओकर संभाल हमार हाथ से ना होई ले। जौन ओकर पर हाथ उठावई ले, ओकर बिगाड़ दई ले। जौन ओकर पकड़े राखई ले, ओकर छूटि जाई ले। चीजें या तरे चलई ले या पीछे, या धीमे या तेज, या बलवान या कमजोर। ईश्वर ज्ञानी पुरुष सब के बहुत कुछ करे से बचई ले, बहुत कुछ ले से बचई ले, जबरदस्ती से बचई ले।

यह मुझसे कैसे संबंधित है?

हम सब के मन में कबो ना कबो जगत के बदले की इच्छा आवई ले। हम चाहत बानी जा कि सब कुछ हमार मन अनुसार होई। जब कि ई chapter हमें सिखावई ले कि जगत के बदले की कोशिश में हम जगत के बिगाड़ दई जा। हमारा जीव में भी बहुत कुछ बदले की चाह बा जेवन हमें दुखी करई ले।

आज मुझे क्या करना चाहिए?

आज हम अपने चारो तरफ के जगत के बिना बदले के देखी जा। जौन कुछ हो रहा बा, ओकर में हस्तक्षेप ना करी जा। अपने मन की चाह को थोड़ा कम करी जा आर जैस बा तैस स्वीकार करे की कोशिश करी जा।

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मेरा चिंतन

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