जा चapter में कहा गइल कि जौन पुरुष पुरुष जानई ले कि नारी सहज सीतल बासी होई ले, ओहकर बल कम ना होई ले बल्कि बढ़ि जाई ले। जैसे गिरि में बहत हुइला नदी, ओह में सब तरह की जल आवई ले बिना कुछ बोले, बिना कुछ माँगे। जौन जानई ले कि उजियरा कहाँ होई ले बाँई अँधेरा कहाँ होई ले, ओकर हिय में सबल सूझ बासी होई ले। जौन जानई ले कि सम्मान कहाँ से आवई ले बाँई अपमान कहाँ से आवई ले, ओकर मति में कोमलता बासी होई ले। यह सब जानि के बाद जौन सरल अकिञ्चन बन जाई ले, ओकर बल सब तरह काम आवई ले।
Key Concepts
雌雄
婴儿
朴
无极
Cite This Chapter
Laozi, Tao Te Ching, Chapter 28, "नर नारी की टेक - जानि अकिञ्चन", laotzu.ai: https://www.laotzu.ai/awa/chapters/28/
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जौन पुरुष जानई ले क्षमा, नारी सहज सीतल धाम।\nगिरि गुंजन प्रवाहिनी भाँती, रहई सदा गंगा सम साम।।\nजब लगि यह मति सबै पावई, तब लगि निज बल नहीं गावई।\nशीश जैस अति अनीत बोलई, तैसें बाँझ न करई कुमारी।।\n\nजानि उजियरा बाँई अँधेरा, जगत बनी सबल अनेरा।\nजब लगि चंचल मति सब भाखई, तब लगि बुद्धि नहिं पहिचानई।।\nजानि महतर सबल सुख दाता, बनई सब रूप सुख नाता।\n\nजानि धवलता बाँई कालिमा, बनई सबल लहि न शिव निभिमा।\nजब लगि अपनी ज्योति न जानई, तब लगि सबल पायर पहिचानई।।\nजानि गरब बाँई अपमाना, बनई सब कहुँ हित हाना।\nजब लगि मति अपनी नहिं जानई, तब लगि पावई मरजाना।।\n\nजानि जय लहई पराजई, तब लगि निज बल नहिं कहुँ गावई।\nनिज पवन को सहज सम्हारई, गिरि गुंजन प्रवाहिनी बनई।।\n\nसहज सरल सबल प्रकृति साधा, काठ की भाँति बनी सब कामा।\nनिर्मम सब सुख उर बस करई, गुरु पद पावई मति धरई।।\nजब लगि यह जानई अकिञ्चन, तब लगि निज बल नहिं जानई।\nशीश जैस अति अनीत बोलई, तैसें बाँझ न करई कुमारी।।\n\nजब लगि निज गुन नहिं पहिचानई, तब लगि गावई सबै बानी।\nनिज बल सब सुख उर बस करई, गुरु पद पावई मति धरई।।
गहरा चिंतन
यह अध्याय किस बारे में है?
जा चapter में कहा गइल कि जौन पुरुष पुरुष जानई ले कि नारी सहज सीतल बासी होई ले, ओहकर बल कम ना होई ले बल्कि बढ़ि जाई ले। जैसे गिरि में बहत हुइला नदी, ओह में सब तरह की जल आवई ले बिना कुछ बोले, बिना कुछ माँगे। जौन जानई ले कि उजियरा कहाँ होई ले बाँई अँधेरा कहाँ होई ले, ओकर हिय में सबल सूझ बासी होई ले। जौन जानई ले कि सम्मान कहाँ से आवई ले बाँई अपमान कहाँ से आवई ले, ओकर मति में कोमलता बासी होई ले। यह सब जानि के बाद जौन सरल अकिञ्चन बन जाई ले, ओकर बल सब तरह काम आवई ले।
यह मुझसे कैसे संबंधित है?
हम अपने जीव में सबले बेसी अपनी ताकत बानने की कोशिश करत बानी जा। जब कि ई chapter हमें सिखावई ले कि सच्चा बल निचलाई स्वीकार करे में बा। जब हम कमजोरी दिखावई जा, नरम बानी जा, तब हमार बल कम ना होई ले बल्कि बढ़ि जाई ले। हम में से हर एक के मन में अकिञ्चन सरलता बा, जेवन हम भूलि गइल बानी जा।
आज मुझे क्या करना चाहिए?
आज हम अपने मन में ई बिचार करी जा कि हम कहाँ पर अपनी ताकत लउकावे की कोशिश करत बानी जा जब कि ओह जगह हम नरम हुइला से बेसी फायदा पावी जा। हम अपने काम में नरम बानी जा के कोशिश करी जा, दूसरन की बात में अपन कहना घटावे की कोशिश करी जा, आर सरल सरल रहे की चेष्टा करी जा।
Who knows his manhood's strength, Yet still his female feebleness maintains; As to one channel flow the many drains, All come to him, yea, all beneath the sky. Thus he the constant excellence retains; The simple child again, free from all stains.
AI Modern
जौन पुरुष जानई ले क्षमा, नारी सहज सीतल धाम।\nगिरि गुंजन प्रवाहिनी भाँती, रहई सदा गंगा सम साम।।\nजब लगि यह मति सबै पावई, तब लगि निज बल नहीं गावई।\nशीश जैस अति अनीत बोलई, तैसें बाँझ न करई कुमारी।।\n\nजानि उजियरा बाँई अँधेरा, जगत बनी सबल अनेरा।\nजब लगि चंचल मति सब भाखई, तब लगि बुद्धि नहिं पहिचानई।।\nजानि महतर सबल सुख दाता, बनई सब रूप सुख नाता।\n\nजानि धवलता बाँई कालिमा, बनई सबल लहि न शिव निभिमा।\nजब लगि अपनी ज्योति न जानई, तब लगि सबल पायर पहिचानई।।\nजानि गरब बाँई अपमाना, बनई सब कहुँ हित हाना।\nजब लगि मति अपनी नहिं जानई, तब लगि पावई मरजाना।।\n\nजानि जय लहई पराजई, तब लगि निज बल नहिं कहुँ गावई।\nनिज पवन को सहज सम्हारई, गिरि गुंजन प्रवाहिनी बनई।।\n\nसहज सरल सबल प्रकृति साधा, काठ की भाँति बनी सब कामा।\nनिर्मम सब सुख उर बस करई, गुरु पद पावई मति धरई।।\nजब लगि यह जानई अकिञ्चन, तब लगि निज बल नहिं जानई।\nशीश जैस अति अनीत बोलई, तैसें बाँझ न करई कुमारी।।\n\nजब लगि निज गुन नहिं पहिचानई, तब लगि गावई सबै बानी।\nनिज बल सब सुख उर बस करई, गुरु पद पावई मति धरई।।
मेरा चिंतन
What does this chapter inspire in you? How will you apply it?