Chapter 10

जीव आत्मा एक राखणो

载营魄抱一,能无离乎?专气致柔,能如婴儿乎?涤除玄览,能无疵乎?
爱民治国,能无为乎?天门开阖,能为雌乎?明白四达,能无知乎?
生之畜之,生而不有,为而不恃,长而不宰,是谓玄德。
जीव ने आत्मा एक राखी संग, विछोड़ो बिना रे।
सूँस निहोरो कइ के नरम राखो, ज्यों बालक निर्दोष रे।
अंतर की आँखी साफ़ करो, दोष दूर बिना कण रे।
प्रजा प्यारी ने राज्य करो, बिना हस्तक्षेप के साधन रे।
आकाश के द्वार खोलो ने बंद करो, माता ज्यों विनम्र रे।
चारों दिशा समझो, ज्ञान के बिना प्रकाश रे।
जीवन देवो ने पालो, मगर मालिक न बनो।
करो मगर अपेक्षा बिना, नेतृत्व करो मगर अधिकारी न बनो।
एहि रहस्यमय गुण के कहियो गुडल रे।

गहरो विचार

इ अध्याय किण बारे में है?

एहि अध्याय मैं पूछिया है के आपण जीव ने आत्मा संग एक राखी सकियो? सूँस निहोरो कइ के नरम राखी सकियो ज्यों नवजात बालक? आपण अंतर दर्पण साफ़ राखी सकियो? प्रजा प्यारी ने देश चलायी सकियो बिना हस्तक्षेप के? जे बात सबसे महत्व के है सो है के जे देवे, पाले, उत्पन्न करे मगर कबूल न करे, करे मगर न थकावे, नेतृत्व करे मगर अधिकारी न बने — एही सच्चा गुडल रे।

इ म्हारे सूं केड़ो संबंधित है?

मैं भी आपण जीव ने आत्मा संग जोड़ी राखणो चाहियो। दिनभर के धकाऊ में मैं बिछुड़ी जावे हूँ — काम मैं, चिंता मैं, भविष्य की फ़िकर मैं। मैं भूली जावे हूँ के मैं की हूँ। आज मैं समझी हूँ के मुझे बिना हावभाव के, बिना अपेक्षा के करणो चाहियो।

आज म्हैं के करणो चाहीजे?

आज मैं कम से कम दो पल आपण साँस मैं समायो, नरम रहणो ज्यों बालक, ने बिना फ़ल की अपेक्षा के कोई एक काम भलाई करूँ।

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