A master of the art of war has said, 'I do not dare to be the host (to commence the war); I prefer to be the guest (to act on the defensive). I do not dare to advance an inch; I prefer to retire a foot.' There is no calamity greater than lightly engaging in war.
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युद्धक विषयमे कहल गेल अछि: हम मालिक नहि बनैत बनैत बलिक सेवक बनैत अन्हि, एक इंच आगु बढ़बाक बजाय एक फीट पीछु हटैत अन्हि। एहि कहल जाइत अछि 'लड़ाइत लोकक बिना लड़ाइ', 'बाँह उठावैत बिनु बाँह', 'शत्रुक सामना करैत बिनु शत्रु', 'हथियार सम्हालैत बिनु हथियार'। सबसँ बडका दुर्भाग्य शत्रुक हल्का में लेबाक अछि, शत्रुक हल्का में लेत ही मूरजक रत्न नष्ट हुअय जाइत अछि। तेहि कारण जखन दुई सेना आमने सामने होइत अछि, तखन शोकग्रस्त वाला जीतैत अछि।
मम विचार
एहि अध्याय अहाँ केँ की प्रेरित करैत अछि? अहाँ एकरा कीदे लागू करब?