यह अध्याय बताता है कि स्वर्ग और पृथ्वी की सनातनता उनके निःस्वार्थ भाव से उत्पन्न होती है। संत व्यक्ति भी स्वयं को पीछे रखकर, अपने अहंकार को त्यागकर, वास्तव में आगे बढ़ता है और सुरक्षित रहता है। निःस्वार्थता ही सच्ची सफलता की कुंजी है।
Key Concepts
无私
长久
后身
天地
Cite This Chapter
Laozi, Tao Te Ching, Chapter 7, "स्वर्ग और पृथ्वी का सनातन स्वरूप", laotzu.ai: https://www.laotzu.ai/hi/chapters/7/
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स्वर्ग और पृथ्वी सनातन हैं। उनके सनातन होने का कारण यह है कि वे अपने लिए जीवन नहीं चाहते, इसलिए वे सदा जीवित रहते हैं। इसी प्रकार, संत व्यक्ति स्वयं को पीछे रखता है, फिर भी वह आगे रहता है; वह अपने शरीर को त्याग देता है, फिर भी वह सुरक्षित रहता है। क्या यह उसके निःस्वार्थ होने के कारण नहीं है? इसी से वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।
गहन चिंतन
यह अध्याय किस बारे में है?
यह अध्याय बताता है कि स्वर्ग और पृथ्वी की सनातनता उनके निःस्वार्थ भाव से उत्पन्न होती है। संत व्यक्ति भी स्वयं को पीछे रखकर, अपने अहंकार को त्यागकर, वास्तव में आगे बढ़ता है और सुरक्षित रहता है। निःस्वार्थता ही सच्ची सफलता की कुंजी है।
इसका मुझसे क्या संबंध है?
यह मुझे सिखाता है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए स्वार्थ और अहंकार को छोड़ना आवश्यक है। जब मैं दूसरों की भलाई के लिए कार्य करता हूँ, तो मेरे अपने लक्ष्य भी स्वतः पूरे होते हैं। यह मेरे दैनिक संबंधों और कार्यों में सहायक हो सकता है।
आज मुझे क्या करना चाहिए?
आज, जब भी कोई कार्य करूँ, पहले दूसरों की आवश्यकता को ध्यान में रखूँ और स्वयं को पीछे रखूँ। देखूँ कि कैसे यह निःस्वार्थ दृष्टिकोण मेरे जीवन में सामंजस्य लाता है।
Heaven is long-enduring and earth continues long. The reason why heaven and earth are able to endure and continue thus long is that they do not live of, or for, themselves. Therefore the sage puts his own person last, and yet it is found in the foremost place; he treats his person as if it were foreign to him, and yet that person is preserved. Is it not because he has no personal and private ends, that therefore such ends are realised?
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स्वर्ग और पृथ्वी सनातन हैं। उनके सनातन होने का कारण यह है कि वे अपने लिए जीवन नहीं चाहते, इसलिए वे सदा जीवित रहते हैं। इसी प्रकार, संत व्यक्ति स्वयं को पीछे रखता है, फिर भी वह आगे रहता है; वह अपने शरीर को त्याग देता है, फिर भी वह सुरक्षित रहता है। क्या यह उसके निःस्वार्थ होने के कारण नहीं है? इसी से वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।
मेरा चिंतन
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