अध्याय 56
ज्ञानी मौन है
मूल
知者不言,言者不知。
塞其兑,闭其门,挫其锐,解其纷,和其光,同其尘,是谓玄同。
故不可得而亲,不可得而疏;不可得而利,不可得而害;不可得而贵,不可得而贱。故为天下贵。
塞其兑,闭其门,挫其锐,解其纷,和其光,同其尘,是谓玄同。
故不可得而亲,不可得而疏;不可得而利,不可得而害;不可得而贵,不可得而贱。故为天下贵。
अनुवाद
जो जानता है, वह नहीं बोलता; जो बोलता है, वह नहीं जानता। अपने छिद्रों को बंद करो, अपने द्वारों को बंद करो, अपनी तीक्ष्णता को कुंद करो, अपने उलझनों को सुलझाओ, अपनी चमक को मंद करो, अपने आप को धूल में मिलाओ—इसे गहन एकता कहते हैं। इसलिए उसके साथ न तो निकटता प्राप्त की जा सकती है, न दूरी; न लाभ, न हानि; न सम्मान, न अपमान। इसलिए वह संसार का सबसे मूल्यवान है।
गहन चिंतन
यह अध्याय किस बारे में है?
यह अध्याय मौन और गहन एकता का महत्व बताता है—जहाँ ज्ञानी व्यक्ति बाहरी भेदों से परे होकर संसार में सबसे मूल्यवान बनता है।
इसका मुझसे क्या संबंध है?
यह मुझे सिखाता है कि सच्चा ज्ञान शब्दों में नहीं, बल्कि मौन और सादगी में है—मुझे अपने विचारों और इच्छाओं को शांत करने की आवश्यकता है।
आज मुझे क्या करना चाहिए?
आज, एक घंटे के लिए मौन रहें—बिना बोले, बिना फोन देखे—और देखें कि यह आपके मन को कैसे शांत करता है।
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