Chapter 72
प्रजा कें भय नहि तखन महान भय आबै छै
मूल
民不畏威,则大威至。
无狎其所居,无厌其所生。夫唯不厌,是以不厌。
是以圣人自知不自见,自爱不自贵。故去彼取此。
无狎其所居,无厌其所生。夫唯不厌,是以不厌。
是以圣人自知不自见,自爱不自贵。故去彼取此。
अनुवाद
प्रजा जखन अधिकारी कें भय नहि करै छै, तखन महान भय आबै छै। जा ठाम प्रजा रहै छै, ओकरा संकुचित मत कए। जा ठाम प्रजा बाँचै छै, ओकरा दबाब मत दए। जे दबाब नहि दै छै, ओ दबाबसँ मुक्त होइ छै। एहि कारण संत आपु कें जाणै छै मुदा आपु कें नहि देखावै छै, आपु कें प्रेम करै छै मुदा आपु कें महान नहि मानै छै। एहि कारण ओ लोग दोसर कें छोड़ कए आपु कें चुनै छै।
गहन चिंतन
ई अध्याय की बारे में बा?
ई अध्याय बताबै छै जे जखन प्रजा कें कोनो भय नहि होइ छै, तखन बड़ भय आबै छै। जे क्षेत्रमे कोनो रहै छै, ओकरा संकुचित मत कएबाक चाही। संत आपु कें जाणै छै, मुदा दिखावा नहि करै छै।
एहि कें हमरा सँ की संबंध?
मह कई बेर दोसरसँ कमजोर लोगके दबाब देबाक प्रयास करै छन्हि। एहि सँ ओ लोग कें दूर करै छन्हि। ई मोहर लेल बहुत कष्टकारी अछि।
आइ हम की करी?
आजि कोनो व्यक्ति कें नहिं दबाब दए। आपु कें जाणू मुदा दिखावा नहि कए। आत्म-ज्ञान कें बाहरी दिखावासँ बेसि महत्व दए।
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मम विचार
एहि अध्याय अहाँ केँ की प्रेरित करैत अछि? अहाँ एकरा कीदे लागू करब?