ई अध्याय पुरान बुद्धिमान लोगन के बारे में बतावत हवे जे ताओ के जानत रहिनी। ऊ लोग सावधान, संकोची, इज्जतदार, खुलल, सच्चा, खुला-मनवा, आओर सहिष्णु रहिनी। ऊ लोग पूर्णता के चाह ना करत रहिनी।
Key Concepts
修道
虚静
不盈
Cite This Chapter
Laozi, Tao Te Ching, Chapter 15, "पुरान बुद्धिमान लोग", laotzu.ai: https://www.laotzu.ai/awa/chapters/15/
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पुरान काल के बुद्धिमान लोग जे ताओ के जानत रहिनी, ऊ लोग सूक्ष्म, रहस्यमय, आओर गहिरे रहिनी, जिनके गहिराई के कोयन समझ ना पावत रहा। एही से ऊ लोग के बखान कइल गवा हवे - धीरे-धीरे डरावन जइसन जइसे पानी में ठंडा में चलल जाय, संकोची जइसे चारों तरफ के पड़ोसी से डरल जाय, इज्जतदार जइसे मेहमान होय, खुलल-खुलल जइसे बर्फ के पिघलत होय, सच्चा जइसे काष्ठ के कच्चापन होय, खुला जइसे घाटी होय, मिला-मिला जइसे गंदल पानी होय। कौन निर्मल कर सकत हवे गंदल पानी के शांत हो के टिके रहे? कौन स्थिर रह सकत हवे धीरे-धीरे चल के? जे ई मार्ग के पकड़े रहवे ऊ लोग पूरा ना करत हवे। एही से अधूरा रहे के कारण ऊ पुरान के बदल के नया बन सकत हवे।
गहरा चिंतन
यह अध्याय किस बारे में है?
ई अध्याय पुरान बुद्धिमान लोगन के बारे में बतावत हवे जे ताओ के जानत रहिनी। ऊ लोग सावधान, संकोची, इज्जतदार, खुलल, सच्चा, खुला-मनवा, आओर सहिष्णु रहिनी। ऊ लोग पूर्णता के चाह ना करत रहिनी।
यह मुझसे कैसे संबंधित है?
हमनी के जीवन में भी ऐसे गुण होई जे बुद्धिमान लोगन में रहे - धीरज, संकोच, आओर खुलापन। लेकिन हमनी के बहुत कम ई सब एक साथ रख पाते हवनी।
आज मुझे क्या करना चाहिए?
आज कम से कम एक गुण के विकसित करे के कोशिश करल जाय - या त धीरज, या त सच्चाई, या त खुलापन। आओर पूर्णता के चाह छोड़ के अधूरापन के स्वीकार करल जाय।
The skilful masters (of the Tao) in old times, with a subtle and exquisite penetration, comprehended its mysteries, and were deep (also) so as to elude men's knowledge. Shrinking looked they like those who wade through a stream in winter; irresolute like those who are afraid of all around them; grave like a guest (in awe of his host); evanescent like ice that is melting away; unpretentious like wood that has not been fashioned into anything; vacant like a valley, and dull like muddy water.
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पुरान काल के बुद्धिमान लोग जे ताओ के जानत रहिनी, ऊ लोग सूक्ष्म, रहस्यमय, आओर गहिरे रहिनी, जिनके गहिराई के कोयन समझ ना पावत रहा। एही से ऊ लोग के बखान कइल गवा हवे - धीरे-धीरे डरावन जइसन जइसे पानी में ठंडा में चलल जाय, संकोची जइसे चारों तरफ के पड़ोसी से डरल जाय, इज्जतदार जइसे मेहमान होय, खुलल-खुलल जइसे बर्फ के पिघलत होय, सच्चा जइसे काष्ठ के कच्चापन होय, खुला जइसे घाटी होय, मिला-मिला जइसे गंदल पानी होय। कौन निर्मल कर सकत हवे गंदल पानी के शांत हो के टिके रहे? कौन स्थिर रह सकत हवे धीरे-धीरे चल के? जे ई मार्ग के पकड़े रहवे ऊ लोग पूरा ना करत हवे। एही से अधूरा रहे के कारण ऊ पुरान के बदल के नया बन सकत हवे।
मेरा चिंतन
What does this chapter inspire in you? How will you apply it?