पढ़ाई-लिखाई, हिकरी-बिहिकरी, चतुराई सब त्यागू द्यौ ता चिंता नीं रही। हां-ना, भलो-बुरो में ज़्यादा फर्क नीं। जे गल्ल सब थी मसतो हे, हूं मसणो जरूर हे। संसारी लोग भोग-विलास में मस्त हे, पर मैं सादगी में रहता हों। दूसरां की चमक-दमक थी मैं अलग हों, म्हारो आसरो बस ई परमात्मा हे।
Key Concepts
独异
愚人之心
贵食母
Cite This Chapter
Laozi, Tao Te Ching, Chapter 20, "पढ़ाई-लिखाई छोड़ू, चिंता नीं रही", laotzu.ai: https://www.laotzu.ai/mwr/chapters/20/
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पढ़ाई-लिखाई त्यागू द्यौ, ता चिंता नीं रही। हां कहणो आरो ना कहणो में कितनो फर्क हे? भलाई आरो बुराई में कितनो दूरी हे? जे गल्ल माणसां थी मसतो हे, हूं मसणो जरूर हे। अनंत हे, बेअंत हे! सब लोग खुश हाट-माळ काटता हे, जैसो राजाई सवारी में बैठू। मैं बस अकेलो बैठो हों, काईं हरकत नीं, जैसो नवजात बच्चो जे अब्जै परायो नीं। थकाथका हों, जैसो कोय ठिकानो नीं। सब लोगां कूै सामान भरपूर हे, मैं बस कुछ खोया-खोया हों। म्हारो दिल मूर्खां जैसो हे! अंध्यारो हे! दूसरे लोग चमकता हे, मैं अंध्यारे में रहता हों। दूसरे समझदार हे, मैं चुपचाप हों। मैं समुंदर जैसो शांत हों, आनंद जैसो बिन थकान। सब लोगां कूै काम हे, मैं बस मूर्ख आरो गरीब। मैं बाकी सबसें अलग हों, म्हारो आसरो बस माया-बापू हे।
गहरो विचार
इ अध्याय किण बारे में है?
पढ़ाई-लिखाई, हिकरी-बिहिकरी, चतुराई सब त्यागू द्यौ ता चिंता नीं रही। हां-ना, भलो-बुरो में ज़्यादा फर्क नीं। जे गल्ल सब थी मसतो हे, हूं मसणो जरूर हे। संसारी लोग भोग-विलास में मस्त हे, पर मैं सादगी में रहता हों। दूसरां की चमक-दमक थी मैं अलग हों, म्हारो आसरो बस ई परमात्मा हे।
इ म्हारे सूं केड़ो संबंधित है?
मैं अक्सर ओ बातां की चिंता करता हों जे लोग कहेगा। सही-गलत की परवाह करता हों, मतलब-बेमतलब की फिक्र करता हों। संसार की चकाचौंध में अक्सर भूल जाया कि असली चीज़ कौन सी हे।
When we renounce learning we have no troubles. The multitude of men look satisfied and pleased; as if enjoying a full banquet, as if mounted on a tower in spring. I alone seem listless and still, my desires having as yet given no indication of their presence. I am like an infant which has not yet smiled. I alone am different from other men, but I value the nursing-mother (the Tao).
AI Modern
पढ़ाई-लिखाई त्यागू द्यौ, ता चिंता नीं रही। हां कहणो आरो ना कहणो में कितनो फर्क हे? भलाई आरो बुराई में कितनो दूरी हे? जे गल्ल माणसां थी मसतो हे, हूं मसणो जरूर हे। अनंत हे, बेअंत हे! सब लोग खुश हाट-माळ काटता हे, जैसो राजाई सवारी में बैठू। मैं बस अकेलो बैठो हों, काईं हरकत नीं, जैसो नवजात बच्चो जे अब्जै परायो नीं। थकाथका हों, जैसो कोय ठिकानो नीं। सब लोगां कूै सामान भरपूर हे, मैं बस कुछ खोया-खोया हों। म्हारो दिल मूर्खां जैसो हे! अंध्यारो हे! दूसरे लोग चमकता हे, मैं अंध्यारे में रहता हों। दूसरे समझदार हे, मैं चुपचाप हों। मैं समुंदर जैसो शांत हों, आनंद जैसो बिन थकान। सब लोगां कूै काम हे, मैं बस मूर्ख आरो गरीब। मैं बाकी सबसें अलग हों, म्हारो आसरो बस माया-बापू हे।
म्हारो विचार
What does this chapter inspire in you? How will you apply it?